सात दशक बाद आजाद हुई भारतीय मुस्लिम महिलाएं

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आयुषी सिंह

आजादी के सात दशक बाद भारत की 8 करोड़ मुस्लिम महिलाएं आजाद हुई है तलाक! तलाक !! तलाक !!! से. उन्हें यह आजादी दिलवाई है सुप्रीमकोर्ट ने. कोर्ट ने ‘तलाक-ए-बिद्दत’ यानी एक बार में तीन तलाक गैर कानूनी और इस्लाम के खिलाफ है. यह इस्लाम का हिस्सा नहीं है इसलिए मुस्लिम इस तरीके से तलाक नहीं ले सकते हैं. इससे इस्लाम को मानने वाली ख्वातीन खुश हैं. वे आज इस डर से भी मुक्त हो गयी जिसके साए में उन्हें यह डर लगा रहता था कि उनके सौहर न जाने कब तलाक दे दे. सुप्रीमकोर्ट के पांच सदस्यीय खंडपीठ ने 22 अगस्त को दिए एक एतिहासिक फैसले में तलाक ! तलाक !! तलाक !!! यानी तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया. फैसले में कोर्ट ने सायरा बानो मामले का भी जिक्र किया. 23 साल की उम्र में सायरा को उसके सौहर ने स्पीड पोस्ट भेज कर तीन तलाक दे दिया था. वर्ष 2016 में सायरा ने सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. सायरा ने तलाक जैसी कुरीतियों से निजात पाने की हिम्मत दिखाई. सुप्रीम कोर्ट ने उसका साथ दिया. तीन तलाक की कुरीति ने मुस्लिम महिलाओं को कई जख्म दिए. उन्हें जिल्लत भरी जिन्दगी जिनी पड़ी. यातनाओं का दंश झेलना पड़ा. किसी ने  बोल कर तलाक दिया तो किसी ने फोन या मोबाइल पर, किसी ने फेसबुक पर तलाक दिया तो किसी ने ई-मेल पर और किसी ने व्हाट्सअप पर. आजादी सबका जन्मसिद्ध आधिकार है पर कुछ लोग इसे धर्म का चोला पहनाकर इसे सालों से दबाया जा रहा था. लेकिन शायरा जैसी आत्मविश्वासी महिला के प्रयास ने धर्म की बेरियां तोड कर अपनी आज़ादी हासिल की. इसके पहले तक तीन तलाक मुददे को मुस्लिम पर्सनल लॉ का अंग माना जाता था. वर्ष 1937 में जब मुस्लिम पर्सनल लॉ को बनाया था तो उसे लिखित करार नहीं किया गया था मतलब ये लॉ लिखित नहीं था. इस कानून के तहत इमाम और उलेमा को धर्म नियंत्रण करने का अधिकार दिया गया. इससे इतर वर्ष 1955 में  हिन्दू पर्सनल लॉ को पूरे देश में  लागू किया गया. इसे रेफोर्मेबल भी कहा गया था यानी इस लॉ को दुबारा सुधारा जा सकता है. लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुद्दे पर किसी ने कुछ नहीं कहा. संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों ने इस मुद्दे को सफलता दिलाई.




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