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वेतन का अधिकार, अदालत व नियोजित शिक्षक

आयुषी चौहान*

बिहार के साढ़े चार लाख स्कूली शिक्षक आन्दोलन की राह पर हैं. उन्होंने 1 फरवरी 2018 से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की घोषणा कर दी है. मुद्दा है समान काम के लिए समान वेतन का. यह मुद्दा सड़क से संसद मार्ग होते हुए अदालत तक पहुंच गई. यानी हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक. लेकिन नियोजित शिक्षकों और संगठनों ने कभी हार नहीं मानी. पिछले दिनों पटना हाईकोर्ट ने नियोजित शिक्षकों के ‘समान काम के लिए समान वेतन’ का हकदार होने का आदेश जारी कर दिया. फिर शिक्षा विभाग सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की बात कह डाली. लेकिन कई शिक्षक संगठनों ने सरकार से पहले ही उपरी अदालत में ‘कैविएट’ फाइल कर दिया. यानी तू डाल-डाल तो मैं पात-पात वाली बात. शिक्षकों के अधिकार और अदालत का खेल पर विराम कब लगेगा ? यह कोई नहीं जानता. यहां तक कि बिहार सरकार तक नहीं. बिहार सरकार सरकारी खजाने पर भारी दवाब पड़ने की बात कहकर नियोजित शिक्षकों को समान वेतन देने के मूड में नहीं है. सरकार तब भी 34 हजार 540 प्रारंभिक शिक्षकों को नौकरी देने के मूड में नहीं थी जब हाईकोर्ट ने इसे सही ठहराया था. लेकिन सुप्रीमकोर्ट के दवाब में इतने शिक्षकों को सरकार को पूर्ण वेतनमान वाली शिक्षक की नौकरी देनी पड़ी थी. लेकिन उससे उत्पन्न खजाने के बोझ को किस तरह से कम किया गया इसे कोई नहीं बता पा रहा. क्या नियोजित शिक्षकों का ‘समान के लिए समान वेतन’ की मांग जायज नहीं है? अगर हाईकोर्ट इसे जायज ठहरा दी तो फिर सुप्रीमकोर्ट जाने की बात क्यों? सुशासन की सरकार बार-बार स्वीकारती रही कि जब नियोजित शिक्षकों का नियोजन सरकार ने की है तो वेतनमान देने की जवाबदेही भी उसी पर है. सरकार ने ऐसा किया भी. लेकिन नौकरशाही आड़े हाथों आ गई. नियोजित शिक्षकों का वेतनमान तय तो कर दी गई लेकिन चपरासी के वेतन से भी कम. यह वेतनमान शिक्षकों के गरिमामय जीवन व्यतीत करने के लिए ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ के समान है. उपर से गरिमा का भी संकट. ‘कम पैसे पर स्कूली शिक्षको के नियोजन’ की अवधारणा देने वाले नौकरशाह मदनमोहन झा अब इस दुनिया में नहीं रहे. लेकिन उन्होंने भी शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव के अपने कार्य काल में स्वीकार किया था कि नियोजित शिक्षकों को गरिमामय जीवन जीने लायक वेतन दिया जाना चाहिए. इतना ही नहीं बिहार में पहली बार बनी सुशासन सरकार द्वारा 2007-08 में गठित ‘समान स्कूल प्रणाली आयोग’  की रिपोर्ट में भी शिक्षकों को गरिमामय जीवन जीने लायक वेतन देने की अनुशंसा की गई थी लेकिन आयोग की अनुशंसाएं ठंढे बस्ते में दबा दी गई.

नियोजित शिक्षकों को वेतनमान मिलने में कई पेचीदगियां है. शिक्षा विभाग इन शिक्षकों को अपना विभागीय कर्मचारी मानने से इनकार करती रही है. विभाग उन्हें पंचायती राज संस्थाओं द्वारा नियुक्त कर्मी मानती है. इसलिए उन्हें वेतनमान देने से इनकार करती रही है. इन शिक्षकों की नियुक्ति पंचायती राज संस्थाओं ने जरुर की है लेकिन वे सभी के सभी शिक्षक काम करते हैं शिक्षा विभाग के राजकीय, राजकीयकृत, बुनियादी और प्रोजेक्ट स्कूलों में. ये विडम्बना ही है कि बिहार सरकार सरकारी स्कूलों में काम करने वाले शिक्षकों को सरकारी कर्मचारी मानने को तैयार नहीं है. लेकिन सरकार इन शिक्षकों से सरकारी कर्मियों से लिए जाने वाले काम मसलन जनगणना, पशुगणना से लेकर लोकसभा और विधानसभा का चुनाव कार्य तक इनसे करवाने से नहीं हिचकती. बिहार विद्यालय परीक्षा समिति मैट्रिक और इंटरमीडिएट परीक्षा की कापियां के मूल्यांकन का कार्य इन्हीं से करवाती हैं.  जिला शिक्षा पदाधिकारी, जिला स्थापना पदाधिकारी और प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी सरीखे शिक्षा विभाग के पदाधिकारी इन शिक्षकों के नियंत्रित पदाधिकारी होते हैं. उनकी नियुक्ति, प्रतिनियुक्ति, स्थानांतरण, निरीक्षण, पर्यवेक्षण, अधिवीक्षण से निलंबन तक  का कार्य शिक्षा विभाग के ये पदाधिकारी ही करते हैं. फिर भी इन्हें शिक्षा विभाग के नियमित कर्मचारी का न तो दर्जा मिला और न ही समान काम के लिए समान वेतन का लाभ. यहां तक कि 11-12 वर्षों की सेवाकाल के दौरान सरकार इनके लिए सेवा शर्त नियमावली तक नहीं बना पाई है.

वर्ष 2006-07 से लेकर 2016 तक बिहार के स्कूलों में एकमुश्त मानदेय वाले शिक्षकों का नियोजन किया जाता रहा है. उनकी नियुक्ति नहीं की गई. इसलिए पूरी स्कूली शिक्षा व्यवस्था ‘नियुक्ति’ और ‘नियोजन’ शब्द के भंवरजाल में उलझ कर रह गई. सरकार इन शिक्षकों को आज भी ‘नियोजित शिक्षक’ मानती है. क्योंकि उनकी ‘नियुक्ति’ तो की ही नहीं गई. इससे इतर राज्य के स्कूलों में शिक्षकों का ऐसा भी वर्ग है जो पूर्ण वेतनमान का लाभ उठा रहे हैं. उनकी मासिक वेतन करीब 40 हजार से 60 हजार रुपये के बीच है. जबकि नियोजित शिक्षकों को 18 हजार से 24 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है. सरकारी स्कूल में ये दोनों वर्ग के शिक्षक बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं फिर भी नियोजित शिक्षकों को समान काम के लिए समान वेतन नहीं मिलता. जो वेतन इन्हें मिलता है वह उसी सरकारी स्कूल के चपरासी से भी कम हैं जिसमें ये नियोजित शिक्षक शिक्षण का कार्य करते हैं. लिहाजा स्कूलों में ‘नियमित’ और ‘नियोजित’ शिक्षकों के बीच वर्ग-विभेद और अकादमिक खाई पैदा हो गई. राज्य की ऊँची अदालत ने भी सरकार के इस वर्गीकरण को ‘वर्ग विभेद’ पैदा करने वाला (क्रियेशन ऑफ क्लास विदिन क्लास’) आचरण करार दिया. हालांकि सरकार ने वर्ष 2016 में नियोजित कैडर वाले शिक्षकों को ‘नियमित नियोजित शिक्षक’ का एक नया दर्जा तो दे दिया लेकिन समान काम के लिए समान वेतन का लाभ नहीं. शिक्षको के ‘जिलास्तरीय कैडर’  को ‘मरणासन्न कैडर’ में बदल दिया अब कोर्ट उक्त कैडर को पुनर्बहाल करने का आदेश जारी कर दिया.

सरकार नियोजित शिक्षकों को ‘समान काम के लिए समान वेतन’ देने से इस लिए हिचक रही है क्योंकि अदालत ने वर्ष 2009 से ही उन्हें इसका लाभ देने का आदेश जारी किया है. अगर सरकार ऐसा करती भी है तो उसे नियोजित शिक्षकों के एक बड़े तबके को लगभग 8 वर्षो के बकाये वेतन का भुगतान करना पड़ेगा. शिक्षा विभाग की दलील है कि ऐसा करने से सरकारी खजाने पर भारी बजटीय बोझ पड़ेगा. राज्य सरकार शिक्षा के इतने बड़े बजटीय बोझ का वहन करने की स्थिति में अभी नहीं है. अर्थशास्त्रियों और शिक्षाशास्त्रियों का मानना है कि सरकार के पास वाकई अगर पैसे का टोटा है तो वह उंची सैलरी वाले मंत्रियों, विधायकों, नौकरशाहों एवं अन्य सरकारी कर्मचारियों के वेतन और भत्ते में कटौती कर शिक्षा पर बढ़ने वाले बजटीय बोझ की भरपाई कर सकती है.

(*लेखिका फ्रीलांस ब्लॉगर है)

 




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