लालू जल्द ही तोड़ेगें सत्ता का दुष्चक्र

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खगेन्द्र कुमार*

बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद का आज भी कोई सानी नहीं है.  22 दिसम्बर को रांची सीबीआई कोर्ट द्वारा लालू प्रसाद  को दोषी करार दिए जाने की घटना से सम्बंधित  टिप्पणियों से सोशल मीडिया अटा पड़ा है . वैसे तो लालूजी के वोटर्स  की सोशल मीडिया पर सक्रियता तुलनात्मक रूप से थोड़ी कम है लेकिन अभी नज़ारा कुछ और है . प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अधिकांश टिप्पणी लालूजी के समर्थन में है. अभिवंचित वर्ग के वे वोटर्स जो राजद को वोट नहीं करते वे भी सत्ता से बाहर ही सही, लालू प्रसाद के राजनितिक पटल पर होने का महत्व समझते हैं . यही कारण है कि लालू को जंगल राज का पर्याय बताने वाले भी अपनी सत्ता को उनके सहयोग के बिना बचा नहीं पाए. राजनीति के उन पवित्र पात्रों ने लालूजी के लिए ही अपमान की सभी हदें न पार की बल्कि अपने डी.एन.ए. की पवित्रता को सावित करने के लिए बिहारवासियों के नाखून और केश को भी दिल्ली भेजने का अभियान चलाया. पवित्रता पर लांछन लगानेवालों के साथ गुपचुप गठबंधन और फिर लालूजी को सत्ताच्युत करने का खेल; कुछ लोग इसे भी बिहार के विकास से जोड़कर देखते थकते नहीं. उन्हें मालूम था  कि बिहार की राजनीति पर अब छलप्रपंच से ही काबिज हो सकते थे. लालूजी के साथ छल करने के बजाय अपने को पवित्र सावित करने के लिए उन्हें जनता के बीच से दुबारा से चुन कर आने का साहस जुटाना चाहिए था. वैसे तो अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ, तेजस्वी और लालू परिवार पर लगे इल्जाम जैसे तर्कों के सहारे गलत और अनैतिक कृत्यों को सही नहीं ठहराया जा सकता. ऐसा नहीं है कि बिहार की जनता सृजन जैसे घोटाले और नेताओं पर लगे अन्य अभियोगों से वाकिफ़ नहीं है. बिहार की जनता इस बात से अनभिज्ञ नहीं है कि जांच का भय भी लालूजी के साथ छल करने का एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है.

बिहार के मुख्यमंत्री कहते हैं कि मैं कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी नहीं करता. जनता के फैसले का चीरहरण करने के बाद उनकी टिप्पणी का कोई लेनवाल भी नहीं है. कराहती राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य व्यवस्थाएं नौकरशाहों से नियंत्रित हो रहीं हैं. पंचायती राज व्यवस्था अपने अधिकारों को तरस रहा है. कब उन 29 विषयों का हस्तांतरण मिल पायेगा पंचायती राज एवं एवं  स्थानीय स्वशासन के निकायों को? नौकरशाहों के नियंत्रण से स्थानीय स्वशासन कब मुक्त होगा?

इसमें कोई संशय नहीं बिहार के जन नेता के रूप में लालू प्रसाद की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण रही है. सत्ता को सामंतों से आज़ाद करने के कर्पूरीजी के पहल को अमलीजामा पहनाने का श्रेय लालू प्रसाद को ही जाता है. सत्ता में कुलीनता ढूंढनें वाली मानसिकता को रसातल पहुचाने में लालूजी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. लालू की सहज राजनैतिक शैली का ही परिणाम था कि इस पटना यूनिवर्सिटी के लॉ ग्रेजुएट को भाषाई सामंत उन्हें अनपढ़ समझते  रहे . लालूजी ने कभी इस मिथ को दूर करने की कोशिश भी नहीं की . लालूजी की  पार्टी ने एक पत्थर तोड़ने वाली महिला को भी लोकसभा के उम्मीदवार के रूप में चुनकर, प्रजातंत्र में जिन मूल्यों की स्थापना की वह विरले ही देखने को मिलाता है.

सामंती ताक़त लगातार लालू राज के बारे में कई भ्रान्तिया फैलाकर उनके इमेज को धूमिल करने की पुरजोर कोशिश करता रहा है.

बहुत से प्रबुद्ध समझे जाने वाले लोग भी  प्रजातंत्र के बजाय जाने अंजाने कुलीन तंत्र की  हिमायत करते नहीं थकते; कॉलेज और यूनिवर्सिटी से बड़ी बड़ी डिग्रीधारी कुलीनों के ही हाथ में सत्ता देना चाहते हैं. ऐसे लोग अक्सर लालूजी को राजनीति से ही हटा देना  चाहते हैं लेकिन इन ताक़तों का सत्ता पर प्रत्यक्ष और परोक्ष  नियंत्रण उनकी मंशा पूरी नहीं होने देती क्योकि आम जनता जानती है कि लालू के रहते ऐसी मंशाओं का कामयाब होना मुश्किल है. 1990 के दशक में मौजूद सामाजिक विद्रूपताओं की जिस भयावह परिस्थितियों से निबटने में लालूजी ने दिलेरी दिखाई और बेजुबानों को जुबान देकर लड़ने की ताक़त पैदा की; उसी को दुबारा से प्रतिस्थापित करने का चालाक और बदले हुए शक्ल में शातिराना  प्रयास शुरू हो गया है. ऐसे लोग लालूजी को पूर्णतः समाप्त कर देना चाहते हैं.

आइये लालू राज के कुछ आंकड़ो पर भी गौर कर लें. लालू राज में बिहार की आर्थिक वृद्धि की दर 4.89% थी जो कि उस समय के सबसे समृद्ध राज्य पंजाब से बेहतर था. 1993-94 से 2003-04 के बीच पंजाब की आर्थिक वृद्धि का दर 4.39% ही था. बिहार की साक्षरता का दर आज भी अन्य राज्यों से कम है. लालू राज में भी कम तो था लेकिन 1991-2001के बीच भारत में साक्षरता दर में औसत 23 % की बढ़ोतरी दर्ज की गयी जबकि बिहार ने 27% की बढ़ोतरी दर्ज की थी. 2002 में बिहार में  शिशु मृत्यु दर 61/ 10000; राष्ट्रीय औसत दर (63/10000) से बेहतर नहीं बल्कि कई विकसित  राज्यों (62/10000) से भी कम था .

  लालू प्रसाद के सरकार में भूमि सुधार को तो अंजाम नहीं दिया जा सका लेकिन सामंती ताक़तों के जकड़न से खेती करने वाले बटाईदार काफी हद तक मुक्त हो अच्छी शर्तों पर खेती करने लगे. सामंतों से मध्य जातियों के  बटाईदारों ने काफी ज़मीन खरीदी भी. लेकिन नितीशजी ने बंदोपाध्याय कमिटी की सिफारिसों को ठन्डे बस्ते में डाल दिया. क्या हुआ समान स्कूल प्रणाली आयोग की सिफारिसों का. नितीशजी इसे भी लागू करने की हिम्मत न कर सके. बंदोपाध्याय कमिटी की सिफारिस लागू करने में तो सत्ताच्युत होने का डर था पर समान स्कूल प्रणाली आयोग की सिफारिसों को लागू न कर पाने की  क्या मज़बूरी थी. सामंती नहीं चाहते की आम बच्चे क्वालिटी एजुकेशन ले पायें. अगर नीतीशजी भूमि सुधार को हर हाल में लागू करने का प्रण लें तो लालूजी के खिलाफ चल रहे सामंती दुष्चक्र को तुरंत समझ पाएंगे. वैसे भी नीतीशजी की न्याय के साथ विकास की संकल्पना भूमि सुधार के बिना ‘सामंती विकास का आधुनिक एवं बदला हुआ मॉडल’ है.

   लालूजी पर 24 दिसम्बर 2017 को प्रकाशित टेलीग्राफ ये वाक्य गौर करने लायक है “लालू ने बिहार में राजनीति को पुनर्परिभाषित किया है. उनका ज़मीनी व्यक्तित्व, समर्थकों के साथ त्वरित जुडाव, धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्धता, और जुझारू प्रवृति उन्हें आज भी जन-नायक बनाये हुए है.” चारा घोटाले की जाँच से सम्बद्ध रहे एक सेवानिवृत सीबीआई अधिकारी श्री ए. पी. दुराई ने अपनी पुस्तक में लालू को इस घोटाले में गलत रूप से फ़साने की बात कहा है. बीजेपी के राज में जितने भी घोटाले सामने आये किसी में भी आजतक कुछ नहीं हो पाया. चर्चित 2 G घोटाले में सीबीआई 6 वर्षों में कोई साक्ष्य नहीं जुटा पाई. आदर्श घोटाले में सुरेश कलमाड़ी और अशोक चवन निर्दोष पाए गए. व्यापम में  भी आज तक कुछ नहीं हुआ. सृजन के घोटालेबाज भी बीजेपी के साथ रहकर महफूज़ हैं. अगस्ता वेस्टलैंड स्कैम, कोल ब्लाक आवंटन घोटाला, टात्रा ट्रक घोटाला, CWG घोटाला, कॉफिन गेट स्कैम इत्यादि दर्जनों घोटालों  का क्या हुआ ? लालू के वर्तमान केस में जगन्नाथ  मिश्र को बरी कर स्थिति को और स्पष्ट कर दिया गया है. श्री लालू प्रसाद के साथ आज वो भी खड़े हैं जो कल तक उन्हें दोषी मानते थे. आनेवाले दिनों में दुर्भावनाओं के महल इस तरह चकनाचूर होंगे कि अवशेष की पहचान भी मुश्किल होगी.

(*लेखक पॉलिटिक इंडिया के प्रधान संपादक हैं.)




One thought on “लालू जल्द ही तोड़ेगें सत्ता का दुष्चक्र

  1. AMIT KUMAR

    तो फिर असली गनाहगार कोन है ? बिना धुएं के आग की कल्पना बेमानी है।

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